Saturday, November 14, 2009

पचमढ़ी




लंबे समय के बहाव से
काटे गए गहरे, उथले, ऊँचे-नीचे रास्तों के बीच
रेत, गोल पत्थरों और
हरियाली के छोटे-छोटे टापूओं को चारों ओर से घेरकर
कल-कल बहता रहता है
झरनों से गिरने के बाद
समतल में पानी...
.....


कैसे अपने बहने / होने / बहते रहने को
किसी भव्य चौखट में जड़ी
कलात्मक तस्वीर की तरह
मढ़ देता है हमारे अंदर
मुझे अक्सर होती है हैरानी...।

Friday, November 13, 2009

इन दिनों




सूरज
आग बरसाता है
पारा
चढ़ता जाता है
ऊपर और ऊपर....
लेकिन
मुझे लगता है
दूर कहीं
बारिश हुई है
सौंधी महक आती है
तू
दूर जाती है
और तेरी
ज्यादा याद आती है....

Thursday, November 12, 2009

चलो,बबूल ही सही,मगर....


काँटें,काँटें,काँटें ही नहीं
बारिश के बाद
बबूल पर भी आते हैं फूल पीले
..........
दो थोड़ी-सी नमी तो
पत्थर पर भी
जम जाती है काई हरी
...........
थोड़ा कुरेदो ,भटको तो
रेगिस्तान में भी
खिला मिलता है नखलिस्तान
...............
सहला भर दो
तो दर्द दवा बन जाता है
बदरंग रोंआं रंगीन
बन जाता है
......
मैं भी मुतमइन हूँ
कोई मुझे भी दे
बारिश,नमी,भटकन,सहलन....
इन्सान बना दे

Wednesday, November 11, 2009

ये आँसू-2




इसलिए नहीं कि
तुमसे दूर हो गया हूँ
इसलिए नहीं कि
बरसों-बरस साथ रहने से
आदत हो गई है
इसलिए नहीं कि
तुम वहाँ कैसे,क्या करोगी
जैसे प्रश्न मुझे मथते हैं
इसलिए तो कतई नहीं कि
अब मुझे अपने काम ख़ुद करने होंगे
इसलिए भी नहीं कि
हड़बड़ी के वक्त
चाबी,पर्स,रुमाल,कंघा और मोज़े
ढ़ूढ़ कर कौन देगा
इसलिए नहीं कि
उठेगा
जब बांहो में तूफान
तो जिस्म एक पास नहीं होगा
इसलिए नहीं कि
नींद में मेरा हाथ
उठकर किस पर गिरेगा
इसलिए नहीं कि
मेरे कमीज के बटन कौन टांकेगा
कौन मेरे कपड़े धोएगा
मेरी चिड़चिड़ाहट,मेरा गुस्सा
कौन शांति से सहेगा
इसलिए नहीं कि
बगीचे में होने वाले
छोटे-छोटे परिवर्तन किसे दिखाऊंगा
ग़ुलाब,गुलदाऊदी,गुड़हल या
गुलमोहर का पहला फूल
तेज़ हवा,गहरे बादल,झमाझम बारिश
हरियाते खेत,चारों ओर भरा पानी
अब किसे दिखाऊंगा
रात के खाने के बाद
ज़बरदस्ती,अपने साथ,
अब किसे घुमाऊंगा
(खुद भी शायद ही जाऊंगा )

बल्कि इसलिए कि
.................
...मैं ..तुम्हें..
तुमसे...मैं..
............
कह नहीं पाऊंगा

Tuesday, November 10, 2009

तीस्ता-2


तीस्ता, ओ तीस्ता, ओ तीस्ता
तू संग चले
ओ तीस्ता

मैं चलूँ जिधर
मैं जाना चाहूँ कहीं
तू रोकती मेरा रास्ता
क्या चाहे तू
ज़रा ये तो बता
तीस्ता ,ओ तीस्ता,ओ तीस्ता........

Monday, November 9, 2009

कामायनी

बाहर झंझा ,आँधी,,बिजली,

उनचास पवन, सौ तूफान आएं
मजाल कि हमारे-तुम्हारे
कभी दरमियान आएं
जैसे डूबती नहीं बल्कि
ऊपर और ऊपर उठकर
तैरती रहती है नाव
चाहे झील में कितना ही
पानी,कितने झरने,कितनी ही
धरधराती धाराएँ आएं....



Sunday, November 8, 2009

किस्मत



अपनी तारीख़ में
तारीक के सिवा
कुछ भी नहीं
आपकी तारीफ़ में
तारीख़ के सिवा
कुछ भी नहीं


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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।