Saturday, January 2, 2010

पिछले सिंहस्थ में




एक लड़की
लंबी दुबली-पतली साँवली-सी
पहना था जिसने
जींस और हाफ शर्ट
पहली-पहली बार
और कमर तक लटकी थी
जिसकी सुगुंफित मोटी चोटी
मेरे साथ थी
पिछले सिंहस्थ में
आज मेरे पास है
थी और भी कई लड़कियाँ
जिनके रंग-रूप पहनावे
लगते थे अच्छे( आज तो कुछ ठीक-ठीक याद भी नहीं)
या याद करना चाहता नहीं
पिछले सिंहस्थ में
जो मेरे आसपास थी
आज न जाने कहाँ हैं
गुम हो गईं है दुनिया के मेले में
क्या इस बार दीख पड़ेंगी औचक

कुंभ के मेले में

Friday, January 1, 2010

मुसीबत तुम्हारी


मेरी सब कविताएँ छप जाएँ...

छप कर दुनिया के पास जाएँ
कुछ आलोचना, कुछ उपेक्षा, कुछ ईर्ष्या पाएँ
मुझ तक भले न पहुँचे
मगर कहीं बातचीत का कारण बनें
-ख़याल अच्छा है-
मगर क्या होगा
जब लोग इसकी
नायिका को ढूँढने जाएँ
और तुम्हें पाएँ
...............................
मैं तो सह लूँगा
  तुम गह पाओगी

Thursday, December 31, 2009

वियोगी होगा पहला कवि...अन्तिम नहीं !


इस बार तुम्हारी दूरी
   कविता नहीं करवाती है
मुझमें अजब-सा सूनापन
अवसाद, शून्यता और बेचैनी भरती जाती है
इस बार तुम्हारी दूरी
मुझसे रचना नहीं करवाती है
कर अवश मुझे
दुखी, वियोगी पात्र
जो मैं हूँ' -- बनाती है
इस बार तुम्हारी दूरी
काव्योचित गरिमा नहीं भर पाती है
प्रेम कहानी के देवदास-नुमा संस्करण को
मेरे बरअक़्स लाती है
इस बार तुम्हारी दूरी
मुझे कवि नहीं बनाती है
जो दूर है अपनी प्रिया से-छटपटाता, धैर्यहीन
ऐसा ऐतिहासिक पात्र बनाती है


Wednesday, December 30, 2009

प्रेम और रूपांतरण

वो मुझे प्यार कर रही है
मैं बूझ लेता जब वो मुझे बताती
मुझे ठंडी हवाएँ पसंद है
मुझे बारिश बहुत अच्छी लगती है
मुझे रातों को देर तक जागना
और उठना सुबह देर से भी
बहुत पसंद है
मुझे डूबता सूरज और पूरा चाँद
इंतेहाई ढंग से अच्छा लगता है
वो मेरी बाहों में बाँहें डाल
सिर सीने से टिका लेती और मुझे
लगता वो किसी घने छायादार पेड़
के तने को बेहद पसंद करती है
वो मुझे बताती रहती जिसे मैं उसके प्यार की
तरह लेता
मुझे गुलाबी, फिरोज़ी और सफेद रंग पसंद है,
मुझे मछलियाँ, रंग-बिरंगी- पालना पसंद है
मुझे किताबें, क्लासिकल और गज़लें पसंद हैं,
मैं जानता था वो यह कहकर
मुझे प्यार कर रही है
मुझे गुलाब और उससे भी ज्यादा
रजनीगंधा पसंद है-- वो कहती
मुझे कपड़े, खऱीदना, नकली जेवर और
असली मोती पसंद है
मुझे हीरा पसंद है--खरीदना है
मैं जानता था वो मुझे प्यार कर रही है
उसे सेब, संतरे, अमरूद और आम
पसंद है-- मैं जानता हूँ
मैं जानता हूँ, उसे कभी-कभार बाहर जाना
पसंद है--बल्कि इससे भी ज्यादा पसंद है
अपने पसंद की चीजों को इकट्ठा
करने की योजना बनाना
मैं जानता हूँ इस तरह वो मुझे प्यार कर रही है
वो मुझे प्यार करती रही
और मैं समझता रहा कि
वो वह सब कर रही है
जो वह चाहती थी करना
मैं पूरी तरह नहीं तो बहुत हद तक
गलत था--क्योंकि
मैं समझता था, जिस तरह मैं
अपनी पसंद को रूपांतरित कर पाता हूँ
अपने प्रेम में, वो भी कर पाएँगी
करेगी--कर पाती होगी--


Tuesday, December 29, 2009

पंचतत्व




पुराने पत्तों के निशान
पेड़ पर कहाँ रह पाते हैं?
उड़कर वहीं कहीं दफन हो
नए पत्तों के लिए खाद बन जाते हैं...
हम पेड़ नहीं इंसान हैं
गो यादें तो रख पाते हैं
यादों के दर्द तो फिर भी
नए रिश्तों ही के काम आते हैं
इधर से देखो या उधर से
हम सब धीरे-धीरे पेड़ बनते जाते हैं
जितना लेते हैं जमीन से,
हवाओं को उतना अधिक लुटाते हैं...
बीज, जड़ें, अंकुर, पौधा, झाड़ी, पेड़, घना वृक्ष
सीढ़ियाँ हैं चढ़ जाते हैं
जिन पुरखों ने लगाया है, उनकी पीढ़ियों के
कभी दरवाजे, कभी खिड़कियाँ,
कभी कुर्सी मेज, अलमारी बन जाते हैं....
अंत कहाँ है कौन जानता
पेड़ हो या इंसा हो
हवा, मिट्टी, पानी
भूमि, आकाश
जहाँ से आए वहीं चले जाते हैं
(फिर-फिर वापस आते हैं)

Sunday, December 27, 2009

गोवा आकर


न मछली पकड़ूँ
न फैनी, ताड़ी बनाऊँ
लिखूँ कविताएँ, कहानियाँ (शायद)
उपन्यास (निश्चित ही)
और महाकाव्य समुद्र पर
सीख लूँ बजाना
गिटार, मेंडोलिन,
तबला या ड्रम
जब भी मिले तनहाई
मन उदास (गर) हो
उसे बजाऊँ..
मैं जहाँ पैदा हुआ हूँ
वहाँ मरना नहीं चाहता...

गोवा में जी करता है


मैं यहीं बस जाऊँ

रात को जाल फैलाऊँ
सुबह समेटने जाऊँ
चढूँ नारियल पर
ताड़ी निकाल कर लाऊँ
काजू फल तोड़ू
सड़ाऊँ, भट्टी पर चढ़ाऊँ
फैनी बनाऊँ
मगर, क्या करूँ उन सबका
पिऊँ, न खाऊँ !!

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।