Friday, January 8, 2010

कहाँ है युवा शक्ति



खाली क्लासें
खाली कैंटीन
खाली लायब्रेरी
खाली मैदान
खाली कॉलेज
खाली स्टेज
कहाँ हो
मेरे देश के भविष्य
.....................!
या कि हम ही वहाँ नहीं है
जहाँ तुम हो।

शरद-बसंत को दोपहर में

खिड़की से आती धूप/ चमक/ रोशनी
एक माइक्रोस्कोप/
रडार/
लाइट-बीम
बन जाती है,
जिसमें चमकता है
हर जर्रा/
महीन कण/
बारीक रेशे,
जो हल्की-सी आहट/
करवट/
हथेली की जुम्बिश से
उड़ते हैं/
तैरते हैं/
गति करते हैं।
उन्हें देखती है
आँखें/
मन/
आत्मा/
तृप्त होती/
संतुष्ट होती/
भरती है।
सोचता/ महसूसता/
अनुभव करता हूँ—यही कविता है।


Wednesday, January 6, 2010

एक शाम बारिश और आहटों की....




छत पर जमा पानी
की परनाले से आती
जमीन से टकराती ततततड़ततत...
बादलों की
घघघघुघुघुघुघरघघ...
बिजली चमकने के बाद की
धड़धड़धधधधड़....
बादलों की तहें एक-दूसरे को
पार करती हुई
हहहहहड़धहह....।
लोहे के हथोड़े से बनते मकान को-
लकड़ी के पीटे जाने की
ठठठठकठठठ....।
फाटक के खुलने की
तितितितितितिड़तितिति...।
दूर किसी के बोलने की
से....जै....की.....ऐ.....।
कुत्तों के भोंकने की

होंहोंहोंहोंहोंभौंहोंहोंहों.....।
हवा के पेड़ों से टकराने की
ससससरससस....।
और उस पर बारिश की
टपटपटपटपटप...।
और पानी भरे बादलों पर से
हवाओं के गुजरने की
ढढढढढकढढढ.....।
और मेरी........
...........
लिखे जाने की
रररररररसरर.....।

Tuesday, January 5, 2010

क्यों ना जोरी जुड़े....


तुम कहती हो कुछ

जब (एक लंबी कशमकश के पश्चात)
तो लगता है जैसे
काट रही हो
खड़ी पकी फसल (अनिच्छा से)
जैसे चाहती हो कि
सूखी फलियाँ कुछ
और दिन रहें
सूखी शाखों पर
और फिर किसी दिन
हवा के तेज-हल्के
झोंकों से बिखर जाएँ
जिन्हें भुरभुरी जमीन
कर ले आत्मसात
.....
और मैं कहता हूँ जब तब
कुछ
तो लगता है (जानता हूँ मैं तो)
जैसे बो रहा हूँ बीज

Monday, January 4, 2010

इस युगांतर के बाद




फिर करेंगे नई शुरुआत
बसाएँगे फिर नई दुनिया
फिर अँगड़ाई लेगा मन्वंतर
ज्यादा गहराई
सामीप्य और परिष्कार के साथ
लेकिन ज्यादा सहज
और ज्यादा प्राकृत

Sunday, January 3, 2010

6 महीने बाद




इस बार तुम जब लौटोगी
मेरी बाँहों में
तो ये लौटना
चिर-प्रतिक्षित होगा
कितनी आकुलता
बेबसी
शून्यता और तड़फ भरे
काटे ये महीने
दिन, पहर, घंटे और पल।
इतने दिनों में
मैं हुआ हूँ ज्यादा आश्रित
और सहाराप्रिय
और शायद तुम भी
लेकिन लौटी हो नई ऊँचाइयों
और गहरी सोच
और गहरी संवेदना लेकर
ज्यादा समर्थ, ज्यादा समझ
ज्यादा ऊर्जा, ज्यादा अनुभव लेकर
मैं तट पर बैठा
लहरें गिनता
बाट ही जोहता रहा
और तुम लौट रही हो
गहरे पानी से मोती लेकर

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।