Friday, February 5, 2010

काव्य-संग्रह विमोचन

मेरी सब कविताएँ छप जाएँ
छप कर दुनिया के पास जाएँ
कुछ आलोचना, कुछ उपेक्षा, कुछ ईर्ष्या पाएँ
मुझ तक भले न पहुँचे
मगर कहीं बातचीत का कारण बनें
-ख़याल अच्छा है-
मगर क्या होगा
जब लोग इसकी
नायिका को ढूँढने जाएँ
और तुम्हें पाएँ
मैं तो सह लूँगा
तुम गह पाओगी

Wednesday, February 3, 2010

याद है धुआँ-धुआँ


गीत है बुझा-बुझा
नेह की ये रश्मियाँ
हम बरसाए तो कैसे
कभी बाती तो कभी तेल नहीं
दीप है बुझा-बुझा
प्रीत के इस गीत को
हम सुनाए तो कैसे
कभी मीत, कभी प्रीत नहीं
गीत है बुझा-बुझा
रात के इस स्वप्न को
हम सजाए तो कैसे
कभी नींद, कभी कुमकुम नहीं
स्वप्न है लुटा-लुटा
संदेश अपने प्रिय को
हम भिजवाएँ तो कैसे
कभी शब्द कभी मेघ नहीं
याद है धुआँ-धुआँ
दर्द नीरव दिल का
हम मिटाए तो कैसे
कभी वो कभी हम नहीं
तीर है चुभा-चुभा

Tuesday, February 2, 2010

पुराने पापी


कौन कहता है
नहीं पी हमने शराब
आँखों से, साकी से, पैमानों से
हम तो वो है
जो गए निकाले
हमेशा मार कर धक्के मैखानों से
पहले साकी ने
पिलाई हमको
नाज से, अदा से, अंदाजों से
पहचाना जब उसने हमको
दूर किया नजरों से, प्यालों से, मयखानों से
कौन कहता है...
ऐ मेरे दोस्त
बता दे मरे दिल का हाल
मेरे साकी को
अहसान तेरा ताउम्र मानूँगा
कहते फिरे हम ये बात
गली-गली अपनों से बेगानों से
कौन कहता है...
तुम तो खुशकिस्मत हो
जो जल जाते हो
अपनी ही शमा के दामन में
हम तो चाह कर भी जल नहीं पाते
रो-रो के
ये कहते फिरे हम
उन आशिक परवानों से
कौन कहता है..
कौन आया है और कौन है गया
अब तो आहट भी सुनाई नहीं देती
खुद में खोए हैं इतना
पूछते हैं हाल खुद का
आईनों से, अक्स से, दीवारों से
कौन कहता है...

कोई पूछे मेरा हाल

तो इतना ही कहना नीरव

अब तो वो रहते हैं

खुद ही से अनजानों से

कौन कहता है...

Monday, February 1, 2010

दर्द की इंतहा


मस्ती हम मतवालों की
जाने कहाँ खो गई
कभी था हमने पिया था जिसको
आज वो हमको पी गई
खामोश रहना आदत कब थी
वक्त ने किया सितम ऐसा
उनके होंठो की ही कोई बात
हमारे होंठ सी गई
मस्ती हम मतवालों की...
ठोकर खाकर जख्म खाते
तो कोई बात थी
हमारी ही एक आदत
आज हमको जख्म हो गई
मस्ती हम...
छूकर जिसको होंठों को
अपनी प्यास बुझाते थे
उसके होंठों की ही छुअन
आज हमको जहर हो गई
मस्ती हम....
हो जाना है ये मर्ज
लाईलाज अब तो नीरव
दुआ से उनकी हर दवा
आज हमको बेअसर हो गई
मस्ती हम...
कोई भी हुनर हमको
अब हँसा नहीं पाएगा
शरारत उनकी ही एक
आज हमको सजा हो गई
मस्ती हम...
कोई भी दर्द हमको
अब रूला नहीं पाएगा
इतना दिया है तुमने नीरव
दर्द की इंतहा हो गई
मस्ती हम...

Sunday, January 31, 2010

अमीत

पा न सका अब तक मैं

कोई एक भी साथी ऐसा
मन की बात जिसे कह सकूँ
मीत बना सकूँ अपने जैसा
की बहुतों ने दोस्ती मगर
दोस्त न बन सका कोई
प्रीत की डोरी बाँधी बहुतों ने
प्रियतम न बन सका कोई
ढाली प्यालों में साथ बहुतों ने
हमप्याला न बन सका कोई
बाँटे बहुतों ने दर्द मुझे
हमदर्द न बन सका कोई
बाँट लूँ जिसके साथ
खुशी गम के लम्हें अपने
पा न सका अब तक मैं
कोई एक भी साथी ऐसा
मन के प्रवाह दबाने से
सरिता न बन सका
ज्वालामुखी बन रह गया मैं
व्यक्त न कर सका भाव अपने
अव्यक्त-सा रह गया मैं
देकर हृदय के उद् गार जिसे
वेदनामुक्त हो सकूँ
पा न सका अब तक मैं
कोई एक भी साथी ऐसा
निकला जब भी गुलशन से
सोचा तोडूँ कलियाँ दो चार
लगा दूँ तेरे बालों में
सोचा था यही हर बार
दिल की बगिया को सवाँरे
कोई माली न मिल सका ऐसा
महका दे मुझको
मेरे तन-मन को
पा न सका अब तक मैंकोई एक भी साथी ऐसा

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।