Saturday, March 13, 2010

चलो चल दें यहाँ से


सड़क के दोनो ओर से पेड़ कट गये
हरे-भरे शहर के जैसे पर कतर गये
वैसे भी मयस्सर नहीं थी ताजादम हवा
उस पर बुज़ुर्गों के भी साये हट गये
रातों को बहुत सब्जोहसीं हो गया मंजर
चौराहों पे नकली दरख्त बिजली से सज गये
कैसे कोई ढ़ूढ़ेगा तेरा पता शहर में
पुराने बरगद मोड़ोगलियों से कट गये
घबरा के अब कहीं जा भी नहीं सकते
गाँव भी सब शहरों से सट गये

Wednesday, March 10, 2010

पूजा से प्यार तक


मंदिर में जाने से अच्छा
किसी बाग में तुझसे मिलने आऊँ
किसी देव की आराधना से अच्छा है
तनहाई में यादों के ख्वाब सजाऊँ मैं

घड़ियाल बजाने से अच्छा
तेरे पायल की झंकार सुनुं
माला जपने से अच्छा है
तुझ तक खत भिजवाऊँ मैं

होम-हवन से अच्छा
प्रियतम, तेरे होंठों का चुंबन
प्रार्थना करने से अच्छा है
गीत प्यार का गाऊँ मैं

आरती उतारने से अच्छा
तेरे रूप का गुणगान करूँ
सिंदूर चढ़ाने से अच्छा है
प्रियतम की माँग सजाऊँ मैं

कदली-फल खाने से अच्छा
तेरे हाथों से अंगूर चखूँ
चरणामृत पीने से अच्छा है
तेरी मधुशाला में आऊँ मैं

भक्त कहाने से अच्छा
मस्ती का मतवाला कहलाऊँ
पुजारी कहलाने से अच्छा है
दुनिया मैं दीवाना कहलाऊँ मैं

नहीं चाहता मैं कोई वर
नास्तिक हूँ, फिर क्यों आस्तिक बन
पत्थर को शीश झुकाऊँ
मेरा पूजन-आराधना, अर्पण-तर्पण, व्रत-विधान तू
तू ही मेरा सब कुछ नीरव, तुझ पर बलिहारी जाऊँ मैं

Tuesday, March 9, 2010

अब भी तू ही


बात है ये तेरे ही होंठो की

सुख के दिन हो, दुख की रातें
खत्म ना होगी, प्यार की बातें
तूफां आएँ चाहे कितने जीवन में
रहेगी नैया एक ही प्रियतम अपनी
बात है ये तेरे ही होंठो की

भूलेंगे नहीं कभी कहा था, तूने
आँखों में भर प्यार जहाँ का
इन आँखों में तो अब भी तू ही,
बदली तेरी परिभाषा ही जीवन की
बात है ये तेरे ही होंठो की

तेरे शब्दों को तो मैंने हरदम
पूजा का-सा मान दिया
गिला है तुझसे बस इतना ही
तूने प्यार को समझा कायरता मेरी

बात है ये तेरे ही होंठो की
जो आज मुझको आज रूलाती है
काश कि पहले जाना होता
तू नहीं वो थी छवि तेरी
बात है ये तेरे ही होंठो की

मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।