Sunday, March 21, 2010

खुशी से मर जाने के दिन

पंख लगाकर उड़ने के दिन आए

सतरंगी लगने लगी दुनिया
आसमाँ आ गया बाँहों में
रंगीन हुए नजारे, फ़िज़ा के
साथ झूमकर गाने के दिन आए
पंख लगाकर...

गुलशन में आ गई बहारें
मौसम खुशनुमा लगता कितना
तितलियों की तरह पंख लगाकर
फूलों पर मँडराने के दिन आए
पंख लगाकर...

एकाध प्याले से अब क्या होगा
प्यासा हूँ मैं जीवन भर का
जब साक़ी बन बैठे खुद तुम
पूरी मधुशाला ही पीने के दिन आए
पंख लगाकर...

जो पल बीते गेसू छाँव तले
जो दिन नीरव साथ गुजारे
उन लम्हों को भर आँखो में
खुशी से मर जाने के दिन आए
पंख लगाकर...

छोड़ता हूँ साँसें


क्या जीत तुमने यदि जीता
मुझको मेरी दुर्बलता के क्षण में
पहले पहल विश्वास दिलाकर पास बुलाया तुमने मुझको
फिर अपने तीखे नयनों से
घायल कर डाला मन को
यह समर की नहीं रीत प्रिये
जीतना है तो
जीतो मुझे समरांगण में
क्या जीता तुमने..

दूर आसमां में उड़ते पंछी को
प्रीत का चुग्गा दिखाकर
बंद किया लौह पिंजरे में
प्रलोभनों का जाल बिछाकर
यदि सचमुच है मुझसे नेह
तो जाने दो मुझे अपने गगन में
क्या जीता तुमने...

एक प्यासा
देख सुराही पास
आया था तेरी मधुशाला
क्या दोष था उस मतवाले का
जो पिला दिया उसको द्रव काला
भोले को पिला हलाहल कहते हो
है जायज़ सब प्यार और रण में
क्या जीता यदि....

अब तो साँसे उठती गिरती
जुबाँ भी लड़खड़ा रही है
तन पर कितने तीर चुभे
मन भी घाँवों से अटा है
अगले युग में तुमको जीतूगाँ नीरव
छोड़ता हूँ साँसें इसी प्रण में

मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।