Saturday, December 4, 2010

चमक-दमक

यार कमल

तेरी स्निग्धता
आब और मधुकोष
देय तो हैं
उसी पंक की
जिससे
ऊब-उबरकर बाहर आया है तू
जो तेरी नियति है
तेरे अस्तित्व का कारण भी
भुलाना चाहे भी तो कैसे
भुलाएगा उसे तू

Friday, December 3, 2010

जैसे खुशबू छूती है फूल को

मैं हर वक्त
देखना चाहता हूँ तुम्हें
जैसे तुम पर छाया रहने वाला आसमान देखता है तुम्हें
जैसे तुम्हारे पैरों तले बिछी जमीन देखती है तुम्हें
जैसे तुम्हारे चारों ओर तनी हुई दिशाएँ देखती है तुम्हें
मेरी आँखे देखना चाहती है तुम्हें
हर उस कोण से जैसे
सारी कायनात और
उसका जर्रा-जर्रा देखता है तुम्हें
मैं हर वक्त छूना चाहता हूँ तुम्हें
जैसे खुशबू छूती है फूल को
जैसे हवा छूती है बदन को
जैसे शरीर छूता है रूह को
जैसे छूती है रोशनी जमीन को
मैं समर्पित होना चाहता हूँ तुम्हें
जैसे अँधेरा ज्योति-किरण को
जैसे जिस्म मीठी चुभन को
जैसे शाम चंदन-बदन को
जैसे खुशबू किसी चमन को

Thursday, December 2, 2010

उसकी किताब

न ये कहानी उसकी
न ये बात उसकी
एक झरोखा-सी बन गई है
एक अदद किताब उसकी
एक पात्र पर वो जा बैठी
एक पात्र मैंने चुना
पात्रों की जुबाँ समझते रहें
वो मेरी
मैं बात उसकी
उसकी छुअन, उसकी गंध
इसी में साँसें उसकी
फड़फड़ा रहे हैं वर्क हवा से
या कँपकँपा रही है जुबाँ उसकी
गाढ़ा कर दिया है कलम से
बहुत-से अल्फ़ाज को मैंने
मेरे खयालों की हमराज
बन गई है किताब उसकी

Wednesday, December 1, 2010

चाँद को गुनगुनाते मैंने सुना है

हौले-हौले गुनगुनाते चाँद को

देर रातों में मैंने कई बार सुना है
सुरमई रातों में जब बादल गहराएँ
बदली के आँचल से जब तारे छिप जाएँ
कभी-कभी हो जब
दीदार चाँद का
तब मीठा-सा मैंने कोई गीत सुना है
हौले-हौले गुनगुनाते चाँद को
देर रातों में मैंने कई बार सुना है
फीकी-फीकी हो चाँदनी जब
ख़ामोश हो फ़िजा सारी
दर्द की एक बस्ती को
आहिस्ता-आहिस्ता मैंने सुना है
हौले-हौले गुनगुनाते चाँद को
देर रातों में मैंने कई बार सुना है
महकी-महकी हो जब रातें
गा रही हो महफ़िल सारी
आकाश के कोने में चाँद को
सिसक-सिसक कर गज़ल गाते मैंने सुना है
तुमने चाँद को कभी
गुनगुनाते सुना है
मैंने सुना है

मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।