Wednesday, May 11, 2011

एकदम से बदल जाता है मुकद्दर

हर बढ़ती हुई शै ही रवां होती है ,पूनम के बाद 
चाँद के साथ चाँदनी भी फ़ना होती है
तरक्की देखमा तो कुदरत की रवायत है,
 रोशन मशाल बुझते ही धुआं देती है

जो मेरा दोस्त था आज हमसफर है
,बदलते रिश्तों से ताज़गी बयां होती है

किसी पल एकदम से बदल जाता है मुकद्दर ,
इसके गहरे में मगर कायनात की रज़ा होती है



मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।