Thursday, May 26, 2011

माथे पे लगी ये रोशनाई


देर तक सोचकरभी न लिख सके कुछ
कोरे कागज की रंगत ये बता देती है
तेरा हाल मुझको तेरी खामोशी बता देती है
तेरी कितनी बातें मुझे तन्हाई सुना देती है
एक मुद्दत हुई देखे को तुझेअब तो आजा
दूर से आती हवामुझको ये सुना देती है
चाहा कि लिखा जाए कोई खत
हश्र पुर्जा-पुर्जा हुई ये चिंदियाँ बता देती है
परेशानी बढ़ी ज्यादा तो उठाई होगी कोई कलम
तेरे माथे पे लगी ये रोशनाई बता देती है

जो 'था' के लिए, जो 'है' की तरफ से


कितना अच्छा लगता है
अकेले होना
दूर-दूर तक खामोशी
और बिखरा सन्नाटा होना
कितना अच्छा लगता है
शोर-गुल से काटकर
खुद को
कलमनुमा
सन्नाटे में बोना
फिर सन्नाटों की जमीन से
कविता बनकर निकलना
कोंपल-दर-कोंपल
फूटकर
कभी उदासी, कभी खुशी
कभी गम के मौसम के बीच
फूलना-फलना
पल्लवित होना
कितना अच्छा लगता है
अकेले होना
खुले आकाश में दिन भर उड़ते फिरना
कभी बादलों से, कभी इंद्रधनुषों से
कभी बारिश, कभी धूप से
गुफ्तगू करना
दिन भर यायावर की तरह फिरकर
वापस नीड़ में लौटना
साथ लाई यादों में से
तुमको चुनना
और घोंसलों में सजाना
सजाते हुए खो जाना
खोकर तुम्हारे पास होना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
और अकेलेपन के इस बीहड़ में
किसी खोह का होना
जहाँ शांति के संगीत का वास
सुनकर जिसे तुम्हें पाना
खुद को खोना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
वीरानों की मरू में
प्यासे मृग-सा भटकना
दौड़ना-दौड़ना निरंतर दौड़ना
न पाना
हार न मानना
और दौड़ना
और यकायक
ओएसिस पाकर
विस्मित होना
मारे खुशी के
अनुभूति शून्य होना
तृप्ति की कल्पना से घबराकर
रूकने से पहले ही
दौड़ और तेज कर देना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
कितना अच्छा लगता है बूँद-बूँद रिसकर
दो किनारों के बीच
धारा-सा बहना
और
सागर में मिलने से पहले ही
प्रवाह के विरुद्ध तैरकर
वापस स्रोत तक पहुँचना
और फिर बहते जाना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
बिखरे पन्नों के बीच
खुद को पाना
सहेजना, संभालना
और क्रमबद्ध करते जाना
अनायास ही कहानी-सा बन जाना
और किसी खास किरदार में
तुमको पाना
भीड़ सी जुट जाना
और भीड़ के बीच
तुमको अलग-अलहदा अकेले पाना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
डूबती शामों के साथ
विदा होते सूर्य को देखना
उड़ते पखेरूओं को बिनना
उनके कलरव को सुनना
भूली कोई बात याद आ जाना
कभी हँसी, कभी खुमार, कभी उदासी छा जाना
देर-देर तक देखना आसमान को
उगते तारों में से अपना तारा पहचानना
और खुद ही से
घंटों बात किए जाना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
घड़ी का बंद हो जाना
समय का रूक जाना
तारीख और दिन की गिनती को
केलैंडर और घड़ी से उतारकर
स्पंदनों, धड़कनों से नापना
सुबह, शाम, दोपहर और रात
बस यही गिनती दोहराना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना
सुबह देर तक सोए रहना
देर तक रातों को जागा करना
सूरज चढ़ आना सूरत पर
गर्मी के मारे नींद खुलना
अभी-अभी आए स्वप्न को देर तक
याद किया करना
जिसमें कहा हो तुमने
उठिए जनाब क्या कुछ और नहीं है करना
कितना अच्छा लगता है अकेले होना

Tuesday, May 24, 2011

वो बच्चा है सचमुच



वो नहीं डरता है मुझसे
बिल्कुल नहीं
जब वो अपने मूड में होता है
मेरी धमकियाँ, मेरी आँखें
मेरी डाँट और मेरे आँसू तक
सब बेअसर होत हैं, उस पे
बस वो करता है, उधम ढेर सारी
वो नहीं रूकता, बिल्कुल नहीं रूकता
मेरे लाख कहने पर भी
पर कभी-कभी
वो डर जाता है मुझसे
बहुत डर जाता है
रूआँसा हो जाता है
मेरी जरा-सी बात पर
वो बच्चा है सचमुच
बड़ा बच्चा

Monday, May 23, 2011

जीना मुहाल है


उफ् ये बंदिशें
ये ताने ये तंगियाँ
जीना मुहाल है
मुझे मयस्सर होगी
कब तुम
कब मिलेगी
तुम्हारे साथ तनहाइयाँ
जीना मुहाल है
तेरे गेसुओं की छाव
तेरी शोखियाँ
कब बजेगी शहनाइयाँ
जीना मुहाल है
अब मुश्किल है इंतजार
मुश्किल हर पल है
अब मुश्किल है जीना
जीना मुहाल है

अपनी नावें, अपने द्वीप


सागरिक
छोड़ो मोह
उन कूलों का
जिन पर लिखी
लीक की भाषा
साहस हो तो खोजो
जीवन बीच भँवर में
देख थके ना तेरी बाँहें
तुझे सर्जना है
नव-परिभाषा

Sunday, May 22, 2011

अनुमान


बहुत
शिद्दत से
यह लगने लगा है
अब मुझे
कि खुलेंगी
सारी गुत्थियाँ
झर जाएँगें, सब अवसाद
लंबी खामोशी के बाद
फिर से
लिखूँगा मैं कथा-कविता-उपन्यास




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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।