Sunday, August 12, 2012

विरोधाभास...


मई-जून की
तेज धूप में
जल जाती हैं
कोंपलें, पत्तियाँ
जड़ें
बच जाती हैं
जुलाई-अगस्त की
बारिश
ठूँठ में भी
रवानी
ले आती है
लगातार तेज बारिश
मगर जब गलाती है
तो जड़ें भी
अपना
अस्तित्व
नहीं बचा पाती हैं
.....................
अभाव
झुलसा देते हों
भले, किंतु
हमारे
मूल्य बच जाते हैं
अमीरी मगर
जब गलाती है
तो
जड़ें, मूल्य, संस्कार
सब
मिटा डालती है
.....................
पुनश्चः
.................
भोग ही में
गर रस पाओ
तो
पहले अपनी जड़ें मजबूत बनाओ

मेरा काव्य संग्रह

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।