Sunday, December 22, 2013

सुख ने थोड़ा हमें थकाया




मैं अपने पिता-सा मजबूत कहाँ हूँ
तुम ही अपनी माँ-सी सुघड़ कहाँ
अलस्सुबह दिन होता था, रात देर से ढलती थी
दौर बदला, बदले हम, शाम कहाँ वो, सहर कहाँ
मेरी ज़द में दसों दिशाएँ, जह हम अलग-अलग थे
एक लीक पर अब हम-तुम, पहले वाली हुलस कहाँ
सुख ने थोड़ा हमें थकाया, तोड़ा भी हमको थोड़ा
हाड़-तोड़ मेहनत वाली, वो पसीने की महक कहाँ
सब कोई अपने थे, हर लम्हा जीते थे
लोग कहाँ वो रीत कहाँ, साज़ कहाँ वो गीत कहाँ

Sunday, November 10, 2013

दर्द गोया हर मर्ज की दवा होती है




थोड़ी-सी उदासी रूह को संवार-सजा देती है
सीली हो अगरबत्ती,ज्यादा ख़ुशबू-धुआं देती है

सुख ज्यादा हो छिन जाता है नींद-चैन
थोड़ी तकलीफ़ ज़िन्दगी को मज़ा देती है

कौन माँगता है तकदीर में ख़लिश-काँटे
पेशानी की सिलवटें हर शै को सजा देती है

जरा-सा नमक बढ़ा देता है लज्जत सबकी
दर्द गोया हर मर्ज की दवा होती है

आग गहरे में हो शख्स बन जाए कुन्दन
सतही गर्मी तो बस मसखरा बना देती है

Friday, October 18, 2013

शरद-पूर्णिमा, नहीं!



जब-जब
तुम अपना वजूद पहचानती हो
चमकते सूर्य की परछाई बन दमकता चाँद बनना नकारती हो
दुनिया में बढ़ जाती है शान, यकीन मानो,
चमक-दमक के इतर तुम अस्तित्व स्वीकारती हो
मेरे लिए स्वयं सूर्य बन जाती हो
मैं ऐश्वर्य नहीं ऐशवर्यपूर्ण सादगी पर मरता हूँ
शरद-पूनम नहीं,सघन-मावस मनाता हूँ
(कवि हूँ न. अँन्धेरों से रोशनी पाता हूँ)
जितनी भी हो खुद से हो रोशन तुम
मैं अपनी चमक को ढँक
तुम्हारे साथ तुम्हारा दिन गुजारना चाहता हूँ

Thursday, September 19, 2013

निचाट एकांत



बजता हो
भले संगीत
मुझे व्यवधान लगता है
हमारे बीच
..................
कुछ नहीं हमारे बीच
केवल रहें हम
निष्कवच
...............
कुछ जुमले तुम्हारे
मेरी हाँ-हूँ
कभी-कभी तो
लगते हैं
ये भी व्यवधान
करते व्यथित
...............
हम तुम जब अकेले हों
काश, हमेशा
बाकी हो तो केवल
रहसंलाप
हमारी आत्माओं के बीच



Thursday, September 12, 2013

जब तक जियो नहीं मारती है जिंदगी


सब भर जाता है तो सब मर जाता है
खाली कर दो खुद को, तो वक्त लौट आता है

हार कर बैठना भी ईलाज है एक किस्म का
हर वक्त जीतने से, इसका मायना मर जाता है

जब तक जियो नहीं मारती है जिंदगी
जिंदादिली से मरना भी, अमर कर जाता है

हम अपने ही प्रेत के होते हैं ग़ुलाम
गुज़रा हुआ तो भूत है, कहाँ लौट पाता है

वक्त जिया तो ठीक, गुज़ारा-गँवाया तो ठीक
हम जो मानें, बही-खाते में वही नजर आता है

Friday, September 6, 2013

ईजाद...!



मैंने ईजाद कर ली है
एक कला
शोर-गुल के बीच
ध्यानस्थ रहने की
तुम भी चाहो तो
इसे आजमा सकते हो,
शांति के लिए...
शहर हो या गाँव
बढ़ती ही जा रही है
आवाज़ें, चिल्लपों, शोर
कहीं वाहनों का, कहीं मशीनों, कहीं मशीनी-इंसानों का
हर कहीं, हर वक्त एक शोर-सा
मचा रहता है
हम चाहें तो भी नहीं बच पाते शोर से
नीरव शांति अब एक दुर्लभ सपना है,
मैंने खोज लिया है
तरीका एक नायाब
भीड़ में शांति तो नहीं
ध्यान लग जाता है,
चिड़चिड़ाहट नहीं होती
जब भी फँसता हूँ ऐसे शोर-ओ-गुल में
बस एक- किसी एक- आवाज़ पर
लगा देता हूँ ध्यान
गौर से सुनता हूँ, सुनने की कोशिश करता हूँ
वही एक आवाज़...
और अचानक
सब आवाज़ें जैसे दब जाती है
सुनाई पड़ती है वही एक आवाज़
और अंतत संगीत में बदल जाती है
कर्कशता से संगीत का यह
कमाल
भरी-भीड़ में, ट्रेफिक जाम में
रैलियों, शादियों, पार्टियों
हर कहीं अपना जज़्बा दिखाता है
और मैं भीड़ में मुस्कुराता नहीं, शांत दीखता हूँ

Monday, August 19, 2013

जीवनी-शक्ति



फूल-फल-टहनियाँ
कोंपल और तना
काटने से भी मरता नहीं
पेड़
जीवन
जड़ों में,
गहराई में होता है
तने और ऊँचाई
में नहीं

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मुझे फूलों से प्यार है, तितलियों, रंगों, हरियाली और इन शॉर्ट उस सब से प्यार है जिसे हम प्रकृति कहते हैं।